Friday, 7 October 2016

आ आज के सावन से कुछ गुफ्तगू करलें
अपनी आँखों में भी एक सावन भर लें
सुनाऊं गाथा में इसे अपने बचपन के सावन की
कहीं ये फिर न बरस जाए सुन के दास्ताँ मेरे सावन की

वो पुष्प प्यारे वो बगीचे आम के
वो कागज की नाव और चाहरदीवारी मेरे आंगन की
वो पल पल बरसना उसका मेरे ही खेतों पे
गांव की हरियाली खास पहल थी मेरे सावन की

वो टोली चरवाहों की वो  ककड़ी चोर दोस्तों का दोस्ताना
वो फिर अदब से किसी बुजुर्ग के सामने पेश आना
फिर चूल्हे में मक्की पकाना एक खास सौगात थी उस सावन की

अब सोच तू भी तू अच्छा या वो अच्छा
तू अपना रौद्र रूप दिखाता और लाखों मासूमों को बहाता है
ये अनचाही शरारत न थी मेरे सावन की
फिर उकेरा मन मेरा याद दिलादि मुझे मेरे बचपन की
तूने फिर ताजा कर दी यादे मेरे नटखट सावन की

सरारत थी उसमें भी पर था बड़ा दया भाव का
दोस्ती निभाने में था वो पक्का
तपिस धूप की जब भी हो तो
बरस जाता था एक दम से
भीगने लगूँ जो में बारिश में तो थम जाता था पलभर में
*नीलम रावत*

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