Saturday, 21 April 2018

मैं वेदनाओं से भरे स्वर लेके चलती हूँ
मिट्टी, मल, भरे हैं फिर भी निर्मल लगती हूँ
हिमालय के सीने से निकल कर
महासागरीय रूप धारण कर लेती हूं
निरंतरता अथाह मेरे बहाव में
मैं न थकती हूँ न रुकती हूँ
पहाड़ पर्वतों की गोद मे हिलोरे खा खा कर
अपनी धरती माँ से कल कल छ ल छल बतियाती हूँ
यूँ सोचिए धरती की गोद में  एक सदी हूँ
हां मैं एक नदी हूँ नदी हूँ नदी हूँ
Neelam

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