मैं मन की विस्मृति जैसे

मैं मन की हूँ विस्मृति जैसे
तू दिया पुरानी यादों  का
मैं तुलसी किसी आंगन की
तू फूल महकते बागों का
मैं समा कोई बुझी बुझी सी
तू जलता जैसे चिरागों सा
में अलसायी शाम कहीं की
तू जेठ की दोपहरों  सा
मैं विरह की ज्वाला जैसी
तू मधुर श्रृंगारी रागों सा
मैं तुझमें कल बिताऊँ अपना
तू रहना मुझमें सदा आज सा
जन्म जन्म की गांठ हो जिनमें
बांधू तुझे रिश्तों के उन धागों सा

नीलम रावत

No comments:

Post a Comment