आओ कभी पहाड़ों में

आओ कभी पहाड़ों में हरे भरे बुग्यालों में
आओ इन शांत घाटियों में इन पहाड़ी ढालों में
फेफड़े सिकुड़ते जा रहे हैं सांस सांस थम रही है
क्यों फंसे हो तुम पश्चात्यता के घोर अंतर्जालों में।।

तुम रूबरू हो जाओ इन पहाड़ी बोलियों से
मिलों  खानाबदोश चरवाहों की टोलियों से
रंग लग जायेगा तुम्हे जब पहाड़ी फागुन का
निःसन्देह होगी नफरत तुम्हें गुलाली होलियों से।।

विशुद्ध हवाओं से हुआ हर मौसम मतवाला है
डाल डाल पे बैठा हर पँछी का गान निराला है
भूल जाओ वो मंदिर मस्जिद की लड़ाई
यहाँ हर बन्दा खुदा का है और हर पत्थर शिवाला है।।

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