Monday, 12 November 2018

आओ कभी पहाड़ों में हरे भरे बुग्यालों में
आओ इन शांत घाटियों में इन पहाड़ी ढालों में
फेफड़े सिकुड़ते जा रहे हैं सांस सांस थम रही है
क्यों फंसे हो तुम पश्चात्यता के घोर अंतर्जालों में।।

तुम रूबरू हो जाओ इन पहाड़ी बोलियों से
मिलों  खानाबदोश चरवाहों की टोलियों से
रंग लग जायेगा तुम्हे जब पहाड़ी फागुन का
निःसन्देह होगी नफरत तुम्हें गुलाली होलियों से।।

विशुद्ध हवाओं से हुआ हर मौसम मतवाला है
डाल डाल पे बैठा हर पँछी का गान निराला है
भूल जाओ वो मंदिर मस्जिद की लड़ाई
यहाँ हर बन्दा खुदा का है और हर पत्थर शिवाला है।।

Neelam Rawat. Powered by Blogger.

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