Sunday, 17 May 2020

Evergreen Backpackers' Cafe in Kasol

था 
समा 
वीरान 
कल तक 
आज रौनक 
फिर लौट आयी 
सूखे पड़े थे स्रोत 
अब पानी से हैं भरे 
बंजर जमीं पर देखो 
अब हरियाली लौट आयी 
आज आंगन में गौरया फिर  
चह - चहाकर  दस्तक  देती 
आज फिर कोयल ने राग छेड़े हैं 
वृक्षों के पाटों में वो वायु का बहना 
आज स्वास लेती मधुबन की लताएं 
ज्येठ नमे ये बसंत का सा आगमन  है 
और उपवन में आज भँवरे गीत गाते हैं 
तितलियाँ कलियों को लाड से ऐसे  पुचकारती 
जैसेकोई माँ बेटी से मानो मुददतों  बाद मिली हो 
एक  टहनी  दूसरी  टहनी से मिलने  को  आतुर  है 
जैसे कोई प्रेमी युगल वियोग में  वरषों से  तड़पा हो 
आज  घटाएं  धरा की  तरफ मुस्कुराते  हुए  आ रही हैं 
आज धरती  बादलों के  स्वागत में स्वयं ही चल  पड़ी है

 नीलम रावत 


5 comments

वाह बहना बहुत सुंदर लिखा है 👌👌

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बहुत सुंदर लिखा है

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बहुत उत्तम...

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वाह। बेहतरीन। पिरामिड की शैली में नए प्रयोग के साथ शब्दों को सजाने के लिए बधाइयां..❣️🙏

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