Saturday, 24 October 2020

 


छोड़ कर फूलों की क्यारी, हमने कांटों के बाग अपनाए
अंधेरों को गले लगाकर,त्यागे अपने हिस्से के उजाले।
थे विरह में मगर, हमने खूब श्रृंगारी गीत गुनगुनाये
और घोर पतझड़ मास को बासन्ती राग सुनाये 
जो हमारे थे कभी ,अब हो गये नयनों के तारे
आज गंगा में विसर्जित कर दिए वो स्वप्न सारे।।


मैं खुशियों के अभिनन्दन में खड़ी थी
मेरी सब वेदनाएं प्रतिक्षित पड़ी थी
निज भीतर उत्पन्न क्रोध से लड़ रही थी
और मैं सम्पूर्ण जग से आगे बढ़ रही थी
आज सारे कष्टों को कर दिया था किनारे
आज गंगा में विसर्जित कर दिये स्वप्न सारे।।


आज विचारों को अपने,गति नई दे दी है मैंने
थी निरर्थक उत्तेजनाएं जो,सब तज दी हैं मैंने
बहुविकल्पीय राह त्यागी एक विकल्प के लिए चली हूँ
लक्ष्य की राहों में कर्मों की परिव्राजिका बन के चली हूँ
आज मृदु वाणी ने त्यागें हैं वचन खारे
आज गंगा में विसर्जित कर दिए हैं स्वप्न सारे।।


आज मन:स्थिरता ने रोके हैं कदम मेरे
अभिलाषाएं मन की, सब्र में बंट गयी हैं
ख्वाबों से बन्ध गयी है "कल्पनाओं की डोर" मेरी
और भावनाएं गीतों से अलंकृत हो गयी हैं
आज व्योम को छूने लगे हैं हमारी व्यथाओं के अंगारे
आज गंगा में विसर्जित कर दिए हैं स्वप्न सारे।।

©® नीलम रावत

3 comments

बेहतरीन। 🥰👍👌👌
व्योम को छूने लगे हैं व्यथा के अंगारे....❤️

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सदा की तरह भावनाओं की बहुत सुंदर अभिव्यक्ति।

आज व्योम को छूने लगे हैं हमारी व्यथाओं के अंगारे

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आप को लिखता देखकर , कुछ लिखने का मन करने लगा है
समझता था जिसे व्यर्थ , उस लेखनी को फिर से उठाने का मन करने लगा है।
यू तो लिख लेता हूं कभी कभार
पर अब इस लेखन को एक नए आयाम तक पहुंचाने का मन करने लगा है।

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