Thursday, 10 December 2020


 समय बदलते देर नहीं लगती। अल्मोड़ा का छोटा सा गांँव बगड़ी जहांँ जन्मी प्रेमा ने निरंतर छलांँग लगाते-लगाते गांँव से जिले, जिले से पूरे राज्य में अपने बूढ़े बोज्यू और बचपन में ही छोड़कर चल बसी ईजी का नाम रोशन कर दिया। अपनी इकलौती च्येली प्रेमा को बाबू ने कभी भी कोई कमी नहीं होने दी। वह आज सबकी आंखों का तारा बन गई। बन गई प्रेमा उत्तराखंड लोक सेवा आयोग की सदस्य। गांँव वालों की भाषा में कहें तो किसी की भी नौकरी, वो भी सरकारी नौकरी पर मोहर लगाने वाली।

पर इन सब बातों से दूर प्रेमा जब से उत्तराखंड लोक सेवा आयोग की सदस्य बनी है उसकी आत्मिक शांति भंग सी हो गई है। उसने इतनी ऊंँची छलांँग क्यों लगाई ? इसलिए कि बोज्यू से दूर हो जाए। जिस बोज्यू को देखे बिना वह घर से स्कूल, कॉलेज नहीं जाती थी, जिसके हाथों को तकिया बना कर सोने पर ही उसे नींद आती थी आज वह इसी इच्छा, चाह को पाने, ठुकरा आई बोज्यू को। यह अलग बात है कि सुनील ने उसके कंटीले रस्तों में फूल बिछाने का काम किया। इस अनंत यात्रा में वह हमेशा उसके संग रहा और इसी संग ने उसे उसकी जीवन संगिनी बना दिया।

आज प्रेमा के पास उसका अपना सुनील है, गाड़ी है, बंगला है, शोहरत है। पूरे राज्य की महिलाएंँ उसे अपना आदर्श मानती हैं। फिर भी वह, जो इन सबसे अनमोल है उसकी टीस उसे हमेशा रहती।

सरकारी छुट्टी का दिन। प्रेमा पांँच बजे ही उठ गई।

सुनील- क्या बात है ? नींद नहीं आई क्या ?

प्रेमा- एक बात कहूंँ 

सुनील- हांँ, बोलो।

प्रेमा- मुझे बोज्यू से मिलना है। क्या मिला लाओगे ?

सुनील- क्यों नहीं ? तैयार हो लो। अभी चलते हैं।

और इस तरह आज लगभग दो महीनों बाद बोज्यू, अपने बोज्यू, बचपन के साथी, अपने-बोज्यू से मिलने प्रेमा सुनील के संग निकल पडी। 

हरिद्वार से अल्मोड़ा का लंबा सफर। मई की गर्मी में भी हवा में ठंडक। बीच-बीच में प्रेमा को कभी नींद आ जाती। कभी गाड़ी के शीशे से बाहर के पहाड़ों को, खेतों-सड़क किनारे चरती गायों को, बहती नदी-झरनों को देख मन ही मन झूम उठती। जैसे-जैसे अपने अल्मोड़ा की तरफ बढ़ रही थी एक मीठी सी गुदगुदी मन में हो रही थी। रस्ते में सरकारी होटल में खाना खाकर फिर चल पड़े अपने गंतव्य की ओर। प्रेमा को हंँसते देख सुनील मन ही मन खुश हो रहा था। उसके लिए प्रेमा की हंँसी से बढ़, कोई चीज नहीं थी।

प्रेमा-(ड्राइवर से) और कितना समय लगेगा 

ड्राइवर- मेम, लगभग आधा घंटा। 

प्रेमा को रस्ता कुछ जाना पहचाना लगा। गाड़ी, पहाड़ियों के घुमावदार रस्तों से होती हुई बढ़ी जा रही थी। नीचे दूर तक फैली घाटियाँ मानो प्रेमा का बाहें फैलाकर स्वागत कर रही थी। इन से बातें करती-करती न जाने कब प्रेमा के मुख से आवाज निकली- ड्राइवर, गाड़ी रोको। सुनते ही ड्राइवर ने ब्रेक लगा दिए। गाड़ी रुकते ही प्रेमा ने सुनील का हाथ पकड़ उसे बाहर खींच लिया। 

बाहर पैर रखते ही वे झूम उठी। बोले जा रही है- सुनील, देखो। यह रहा मेरा स्कूल- राजकीय कन्या इंटर कॉलेज चौखटिया, जहांँ मैं पढ़ती थी। चलो सुनील, स्कूल चलते हैं।

सुनील- हांँ क्यों नहीं ?

वह उमंग में झूमती हुई सुनील का हाथ पकड़े स्कूल की दहलीज पर पहुंँची। वहीं खड़ी हो गई बुत बनकर।

सुनील- क्या हुआ ? तुम रुक क्यों गई ?

प्रेमा- सुनील। बोज्यू कहते थे बेटी, स्कूल विद्या का मंदिर होता है। मंदिर में जाने से पहले वहांँ की मिट्टी को चुचकारना चाहिए। तभी तो हम बड़े बनेंगे। ये कहते हुए प्रेमा ने नीचे झुक स्कूल के गेट के बाहर की मिट्टी ले, उसे अपने माथे पर लगाया। बाहर आई सरकारी गाड़ी को देख निरीक्षण कर रही प्रिंसिपल साहिबा सकते में आ गई। बच्चे, जो बाहर घूम रहे थे उन्हें अंदर करने लगी। दूसरे साथी अध्यापक भी बच्चों को अंदर कक्षाओं में जाने का आदेश देते नजर आए। प्रेमा और सुनील प्रिंसिपल ऑफिस की ओर बढ़े जा रहे हैं। दूर से आती बड़ी अधिकारी को देख प्रिंसिपल साहिबा के पसीने छूट गये। रिटायरमेंट के करीब बैठी आंँखें ठीक से पहचान ही नहीं पा रही थी कि यह कौन सी अधिकारी है ? डी. ई. ओ. साहिबा, नहीं-नहीं, शिक्षा मंत्री जी- नहीं, नहीं। थोड़ा और करीब आने पर- अरे प्रेमा बिटिया। पहचानते ही सारी परेशानियांँ छू मंँतर हो गई। थोड़ी देर पहले जो डर उस पर हावी था उसे उसने धराशाई कर दिया। 

प्रेमा ने हाथ जोड़ उन्हें प्रणाम किया। सुनील ने भी आगे बढ प्रिंसिपल मैम के पैर छुए। 

प्रिंसिपल- अरे बिटिया, तुमने तो डरा ही दिया। लगा, पता नहीं कौन अधिकारी औचक निरीक्षण को आ पहुंँची। तुम तो जानती ही हो कि आजकल....।

प्रेमा- यहांँ से गुजर रही थी। सोचा मिलती चलूँ। आपके स्नेह को कैसे भुला सकती हूंँ। ईजी की हर जिम्मेदारी का पाठ पढ़ाया है आपने।

प्रिंसिपल- आओ, अंदर चलो। 

बाहर पास की कक्षा में खड़ी मैडम को बुलाकर- अरे सुनीता। सुनो, जल्दी से चाय पानी का प्रबन्ध करो। अपनी प्रेमा आई है। 

सुनीता-अच्छा मैम।

कुछ ही मिनटों में यह खबर पूरे स्कूल में आग की तरह फैल गई। जो अध्यापक सहमे हुए थे उनके चेहरों पर हंँसी की फुहार फूट उठी। चल पड़े अपनी प्रेमा से मिलने, छोटी प्रेमा से जिसको उन्होंने पढ़ाया था। भले ही आज वह उत्तराखंड लोक सेवा आयोग की सदस्य हैं पर उनके लिए तो उनकी वही छोटी बेटी है न जिसका कान पकड़ सबक याद कराते थे, पाठ सुनते थे। सब अपने पर गर्व महसूस कर रहे हैं कि उनकी पढ़ाई बेटी आज इतनी बड़ी अधिकारी बन गई।  


प्रेमा- मैम चाय-वाय रहने दो। 

प्रिंसिपल- बेटी घर आए और बिन खाए पिए चली जाए।

प्रेमा- मैम। बहुत साल हो गए स्कूल देखे। क्या दिखाएंँगी नहीं। 

प्रिंसिपल- क्यों नहीं बेटी ? चलो।

प्रेमा, सुनील, प्रिंसिपल मेम ऑफिस से निकल कक्षाओं की ओर बढ़ चले। कक्षा में बैठी नीले कमीज और नीली फ्रॉक पहनी लड़कियों में प्रेमा अपने को ही देखे जा रही है। सामने पढ़ा रहे गुरुजी उसे ही पढ़ाते लग रहे हैं।

प्रेमा- मैम, दिल हल्का हो गया। अपने स्कूली दिन याद आ गए। अचानक, मैम ओमिश सर कहांँ है ? क्या रिटायर्ड हो गए ? 

प्रिंसिपल- नहीं, अभी कुछ महीने बाकी हैं। आओ, कहते हुए प्रिंसिपल प्रेमा को साइंस लैब की ओर ले गई।

साइंस लैब में पूरी तल्लीनता से प्रयोग पर दृष्टि डाले लड़कियों का झुंँड और उनके बीच में उन्हें समझाते ओमीश सर। 

प्रिंसिपल को अंदर आते देख बच्चे सुन्न हो गए। ओमीश सर ने धुंधीयाई आंँखों से सामने देखा। थोड़ी देर बाद ओमीश सर- अरे प्रेमा, तुम। 

प्रेमा (हाथ जोड़ते हुए)- सर नमस्ते। (सुनील को) मेरे गांँव के ओमीश सर।

सुनील ने हाथ जोड़ उनके चरण स्पर्श किये। 

ओमीश, प्रेमा और सुनील का सिर पुचकारते हैं। बच्चे कुर्सियांँ उठा लाए। 

ओमीश- बेटी, तुम हमारे गांँव, स्कूल व अल्मोड़ा की ही नहीं पूरे उत्तराखंड की शान हो। तुम ने जो कर दिखाया वह छोटा काम नहीं था। आज पूरा गांँव, अल्मोड़ा तुम्हें अपना आदर्श मानता है। हमें तुम पर नाज है। 

प्रेमा- चाचा, इसके असली हकदार तो आप हैं। आप नहीं होते तो हम कैसे पढ़ते ? कितनी बार आपने हमारी फीस भरी, ड्रेस-किताबें दिलाईं। घर पर पढाया, सफलता-विफलता के बारे में बताया, कुछ करने का जज्बा जगाया। प्रिंसिपल मैम और आप ही मेरे सच्चे हीरो, मेरे आदर्श हैं। आज पूरे उत्तराखंड को आप जैसे सच्चे समर्पित अध्यापकों की आवश्यकता है। 

ओमीश (बच्चों की ओर)- बेटी नैंसी, तुम पूछती रहती हो न कि प्रेमा जी से मिलाइए। तुम्हें कहता था न। एक दिन स्वयं खींची आएगी। लो आ गई। यही है हमारी अल्मोड़ा, उत्तराखंड की शान-प्रेमा। 

प्रेमा (नैंसी को) - इधर आओ। 

नैंसी - नमस्ते मैम। 

प्रेमा- मैम नहीं, दीदी। बड़ी दीदी। तुम सब के लिए मैं अभी भी दीदी हूंँ। (पर्स खोल, उसमें से दो हजार निकाल प्रिंसिपल मेम को देते हुए) मेम, मेरी ओर से सभी बच्चों को मिठाई खिलाना। इनमें मेरा ही रूप है। ये भी बनेंगी आने वाले उत्तराखंड की, भारत की प्रेमा।

प्रेमा (बच्चों की ओर)- अच्छा बच्चों। बाय। 

सभी बच्चे- बाय दीदी। 

प्रेमा (ओमीश सर को)- चाचा जी,  घर जा रही हूंँ। शाम को खाने पर जरूर आना। चाची को भी लाना।

ओमीश सर-  अच्छा बेटी। सुनील और प्रेमा का सिर पुचकारते हैं फिर बच्चों को पढ़ाने लग जाते हैं। 

प्रेमा चाय पी, प्रिंसिपल को- अच्छा मैम चलती हूँ। आप भी शाम को खाने पर जरूर आना। 

प्रिंसिपल- अच्छा बेटी। सदा खुश रहो। 

गाड़ी में बैठते हुए- देखा सुनील, आज मैं स्कूली दुनिया में चली गई थी। कितनी खुशी थी, कितना प्यार था ना वहाँ। न कोई चिंता, न कोई गम। बस ज्ञान ही ज्ञान। जितना चाहो झोले में भर लो। सच। मेरे जीवन के सबसे रंगीन पल थे वे पल। हर साल फर्स्ट आने के लिए मशक्कत करने में बड़ा आनंद आता था। पूरे स्कूल में जब नाम अनाउंस होता था तो दूर खड़े बोज्यू की आंँखों से आंँसू निकल आते। जितना पौंछते उतने ही निकलते रहते। तब तक जब तक उन्हें आगे बढ़ गले न लगा लेती। मुझ में अपने को जिया है उन्होंने। कहते-कहते कब गांँव पहुंँच गए पता ही नहीं चला।

गांँव पहुंँचते ही चौक पर बैठे लोगों ने माथे व आंँखों के आगे हाथों की छत बनाकर पहचानने का जतन किया। गाड़ी धीरे-धीरे आगे बढ़ती रही। घर के बाहर खड़ी हो गई। उत्तराखंड लोक सेवा आयोग की सदस्य बनने के बाद पहली बार प्रेमा घर पर आई है। अपने घर, उस घर में जहांँ की मिट्टी में खेल-लेट कर बड़ी हुई। भले ही वह आज राज्य की शीर्ष अधिकारी है पर उसका घर तो वैसा ही है जैसा पहले था। वही लकड़ी का बना छोटा सा मेन गेट का दरवाजा जिसकी कुंँडी ऊपर से हटा वह अंदर गई। अंदर घुसते ही दोनों तरफ बनी फूलों की क्यारियांँ, जिन पर पीले, नीले, गुलाबी फूल खिले हैं। वहीं दूर छप्पर में बंधे पशु। सामने कमरे की जाली जो तब भी बंद ही रहती थी जब प्रेमा स्कूल से, कॉलेज से पढ़कर घर आती थी। जैसे पहले आवाज लगाती थी आज भी वही शब्द बोले जा रही है- बोज्यू, ओ बोज्यू। कहांँ हो ?

कहते-कहते जालीदार दरवाजा खोल देखा। अंधेरे में चारपाई पर लेटे बोज्यू बोले- कौन ? पहचानते हुए। अरे प्रेमा बेटी।

प्रेमा- बोज्यू। क्या हाल बना रखा है। मुझे पता था कुछ न कुछ गड़बड़ है। इसलिए आई। बाहर से दरशन ताऊ को आते देख

प्रेमा (हाथ जोड़कर)- ताऊ राम-राम। बोज्यू ने क्या हाल बना रखा है। देखो न। 

दरशन (प्रेमा को पुचकारते हुए)- बेटी प्रेमा। सारा दिन बस लेटे रहते हैं। लेटे-लेटे रोते रहते हैं। कहते हैं बेटी की याद आती है। एक पल भी जिससे दूर नहीं हुए उसे देखने खातिर तड़पते रहते हैं। (कमरे की बिजली जलाते हुए) यह देख बेटी। पूरा अंँगोछा पसीने से नहीं, आंँसुओं से भिगोए रखते हैं। 

प्रेमा (बोज्यू को गले लगाते हुए)- बोज्यू। कितनी बार कहलवाया हरिद्वार आ जाओ। क्यों नहीं आए ? 

बोज्यू- बेटी हरिद्वार तो अब अस्थियांँ ही जाएंँगी।

प्रेमा- फिर शुरू हो गए आप। 

बोज्यू (उठते हुए)- दरशन कुछ ठंडा लाओ। चाय बगैरा बनाओ।

दरसन- अभी लाया।

बोज्यू- बेटे सुनील। कैसे हो ?

सुनील- अच्छा हूंँ, बाबू जी। 

बोज्यू- तुम बैठो। मैं भी आता हूंँ। 

प्रेमा- कहांँ जा रहे हैं आप। स्पेशल आपके लिए, आपको ले जाने के लिए आई हूंँ। समझे। 

बोज्यू- अभी आया बेटी। तुम लोग बैठो। (उठकर बाहर चले जाते हैं)। 

बाहर से दरशन ताऊ को देख प्रेमा- ताऊ जी। आप बोज्यू का ध्यान नहीं रखते न।

दरशन- बेटी प्रेमा। तेरे बोज्यू पहाड़ हैं पहाड़। कहते हैं जीवन सफल हो गया। बेटी अफसर बन गई। अब जी कर क्या करूंँगा। कुछ नहीं करते। न खेती, न पशुओं की देखभाल। बस ऐसे ही पड़े रहते हैं। तुम्हें याद करते रहते हैं। कल ही कह रहे थे दरशन, सपना आया है प्रेमा आने वाली है और आज ही तू आ गई।

प्रेमा- हांँ ताऊ जी। कुछ रिश्ते बिना तारों के मीलों दूर बैठे अपनों से जुड़ जाते हैं। दे जाते हैं अपनों के संदेशे। और हम दौड़े चले जाते हैं उनसे मिलने।

दरशन- बेटी। ऐसे कब तक चलेगा ? 

प्रेमा- ताऊ। मैं इन्हें लेने आई हूंँ। लेकर ही जाऊंँगी।

दरशन- ये जाएंँगे तब न। 

प्रेमा- इन्हें जाना ही होगा। मेरे लिए, मेरी खुशियों की खातिर।

इतने में बाहर से आ बैठे बोज्यू। दरशन भी उठकर चाय लेने चले गये। प्रेमा, (बोज्यू के हाथों में अपने हाथ लेकर) बोज्यू, आप इस दुनिया के सबसे अच्छे बोज्यू हैं। मुझे यहांँ तक कैसे पहुंँचाया, आप ही जानते हैं। आज तुम्हारी प्रेमा तुमसे भीख मांँगती है अपनी खुशियों की। क्या उसे खुशियांँ नहीं दोगे। बोलो बोज्यू।

बोज्यू- बेटी। मेरा जो कुछ है सब तेरा ही तो है। 

प्रेमा- मुझे वह सब कुछ नहीं चाहिए। मुझे मेरे बोज्यू चाहिए, जिसे मैं रोज अपने पास देखूँ, जिससे जी भर के बातें कर सकूँ, जिसके साथ अपने सुख-दुख साझा कर सकूँ। 

बोज्यू- बेटी प्रेमा। तुम जानती हो न। बेटी पराया धन होती है। उन्हें एक न एक दिन घर छोड़कर जाना ही होता है। 

प्रेमा- आप तो मुझे अपना बेटा कहते थे न। आज वही बेटा, कैसे बेटी हो गई ?  कैसे पराया धन हो गई ? 

बोज्यू- यह शाश्वत सत्य है। इसे भुलाया नहीं जा सकता। 

प्रेमा- इसका मतलब यह कि आप हमारे संग नहीं चलेंगे। 

दर्शन चाय ले आया। सबको देते हैं। 

प्रेमा- दरशन ताऊ जी। अब दो ही काम होंगे या तो बोज्यू हमारे साथ चलेंगे या फिर मैं दोबारा कॉलेज की नौकरी ज्वाइन करूंँगी। कम-से-कम इनके पास तो रहूंँगी। इनकी सेवा तो कर सकूंँगी।

बोज्यू- पागल हो गई हो क्या ? लोग तरसते हैं ऐसी नौकरी को। 

प्रेमा- तो फिर आप हमारे साथ चलेंगे और कुछ नहीं। हम कल सुबह ही निकल लेंगे। दैट्स ऑल। दरशन ताऊ जी, शाम को खाने पर ओमीश सर और प्रिंसिपल मैम आएंँगी। 

दर्शन- कोई बात नहीं बेटी। बहू को मैंने खाने के लिए बोल दिया है। 

प्रेमा- (सुनील को)-आप बोज्यू के पास बैठिये। मैं ताई जी से, सब से मिलकर आती हूंँ। 

सुनील- ओके।

शाम का समय। प्रेमा के घर ओमीश सर व प्रिंसिपल साहिबा, दरशन ताऊ, बोज्यू, सुनील सब बैठे गप्पे हांँक रहे हैं। प्रेमा के पुराने दिनों को याद कर रहे हैं। गांँव के प्रधान भी आ गए। दरशन और उनका एक साथी खाना लगा रहे हैं। खाने में झोई भात, भुज की बड़ी और गरमा गरम रोटियांँ। सब खाना खाए जा रहे हैं और बातें किए जा रहे हैं। 

गांँव का प्रधान- बेटी प्रेमा। सुना है तुम बहुत बड़ी अधिकारी बन गई हो। सुनकर बहुत खुशी हुई। हमेशा तरक्की करो। 

प्रेमा- चाचा जी धन्यवाद। 

ओमीश सर- यह सब बोज्यू की मेहनत का नतीजा है। फल है। कभी बिटिया को कोई कमी नहीं होने दी। दस-दस कोस से पैदल जाकर किताबें लाते थे। न सर्दी देखी, न गर्मी। झोंक दिया अपने को बेटी की सफलता में। 

बोज्यू- ऐसा नहीं है ओमीश जी। क्या आप की मेहनत कम है ? कितना पढाया आपने, प्रिंसिपल साहिबा ने। आपने जो संस्कार भरे भला वह हम कैसे भर पाते। हम सदैव आपके ऋणी रहेंगे। 

प्रिंसिपल साहिबा- हमने तो आपको बहुत पहले ही बता दिया था। लड़की एक न एक दिन पूरे उत्तराखंड का नाम रोशन करेगी और उसने वह कर दिखाया।

प्रेमा- सच कहूंँ तो प्रेमा आप सब के बिना अधूरी है। आप सब ने मिलकर ही गांँव की प्रेमा को वहांँ पहुंँचा दिया जहांँ हर प्रेमा जाना चाहती है। (गांँव के प्रधान की ओर) चाचा जी। 

प्रधान- बोलो बेटी। 

प्रेमा- आजकल सरकार बच्चों की पढ़ाई पर विशेष ध्यान दे रही है। अपने गांँव में एक लाइब्रेरी क्यों न बनवाई जाए। जहांँ बच्चे, लड़के-लड़कियांँ बैठ कर पढ़ सके। कम्पीटीशन की तैयारी कर सकें। 

प्रधान- बेटी, तुम ठीक कहती हो। यह तो हम अपने ग्रांट से ही करा देंगे। 

प्रेमा- कोई मदद चाहिए तो बता देना। वहांँ पर रखी जाने वाली किताबों का प्रबंध मैं ही कर दूंँगी। इन बातों में मैं यह तो भूल ही गई कि आप लोगों को बुलाने के पीछे मेरा मकसद क्या है। मैं बोज्यू को अपने साथ ले जाना चाहती हूंँ पर बोज्यू हैं कि टस से मस भी नहीं हो रहे। आप ही समझाइए। यहांँ गांँव में अकेले कैसे रहेंगे ? 

बोज्यू- बेटी हम अकेले थोड़े ही हैं। ये सब तो हैं हमारी देखरेख में। दरशन है, बच्चे हैं। क्या नहीं है यहांँ। 

प्रेमा- बोज्यू, क्या आप हमसे प्यार नहीं करते। क्या हम ऐसे ही छोड़ दें तुम्हें यहांँ। दम घुटने के लिये।  क्या आपने मुझे इसीलिए पढ़ाया था कि मैं सफल हो के मुंँह फेर लूँ। यही कमी है न कि मैं आपका लड़का नहीं। जन्म लेते ही मांँ चल बसी। मुझे कभी मांँ की याद तक नहीं आने दी आपने। फिर आप यह कैसे भूल जाते हैं कि मैं आपको ऐसे यहांँ इस हाल में छोड़ सकती हूंँ। 

ओमीश-  बेटी सही कह रही है। उसके साथ रहोगे तो उन्हें भी अच्छा लगेगा। फिर यहांँ है ही क्या ? कभी दिल करे आ जाया करना घूमने। 

बोज्यू- ओमीश जी यहांँ क्या नहीं है ? यहांँ प्रेमा की मांँ की यादें हैं। मेरे खेत हैं। बलध हैं। प्रेमा की यादें हैं। प्रेमा का स्कूल है और आप सब हैं। आप ही बताएंँ क्या मैं इन्हें छोड़ कर जा सकता हूंँ। 

दरशन- बेटी। तुम्हारे बोज्यू को बचपन से जानता हूंँ। बहुत जिद्दी किस्म के हैं। एक बार जिद्द कर ली तो कर ली। नहीं जाएंँगे यहांँ से। यहीं जन्मे हैं। कहते हैं- दरशन यहीं मरूंँगा। प्रेमा की मांँ है यहांँ जो मुझे दिलासा देने आती है। मुझसे बातें करती है। 

प्रेमा- ठीक है ताऊ जी। अब मैं भी यही चाहती हूंँ कि बोज्यू यहीं रहे। मुझे ही कोई रास्ता निकालना होगा।

बोज्यू-  बेटी मुझे समझने की कोशिश करो। मैं बूढ़ा। मुझ बूढे के लिए क्यों व्यर्थ में आँसू बहा रही हो।

प्रेमा- आप मेरे लिए क्या है ? वह मुझे ही पता है।

सब खाना खा चले जाते हैं। अगली प्रातः 

प्रेमा- अच्छा बोज्यू। मैं जा रही हूंँ। जल्दी ही दोबारा मिलने आऊँगी। (पर्स से एक कपड़े में लिपटी कोई वस्तु शायद पैसे देते हुए)- रख लो। मना मत करना। (दरशन को)-अच्छा ताऊ जी। बोज्यू का ध्यान रखना।

वहांँ खड़ी ताई और सब बच्चों से मिल, गाड़ी ओर बढी। गाड़ी में बैठते हुए, गाड़ी से बाहर आ गई। सामने खड़े बोज्यू को गले लगाया। कुछ पल के लिए लगा जैसे समय रुक गया है। सांसे थम गई हैं। हवा ने चलना बंद कर दिया है। पंछी भी चहचहाना भूल गए हैं। प्रेमा बोज्यू को देखती है। बोज्यू की आंखों से आंँसू पौंछती है। बोज्यू प्रेमा के आंँसू पौंछते हैं। कैसा अद्भुत दृश्य है।

दरशन ने बोज्यू को संभाला। प्रेमा एक ही झटके में सब को हाथ जोड़ गाड़ी में बैठ चली गई। सब जाती गाड़ी को ओझल होने तक देखते रहे। बोज्यू वहीं बैठ गये। दरशन ने उन्हें पानी पिलाते-पिलाते कहा- घबराओ मत। सब ठीक हो जाएगा। 

गाड़ी मैं बैठी प्रेमा (सुनील से)- सुनील, तुम मेरा साथ दोगे ना। 

सुनील- हांँ। बोलो। 

प्रेमा- मैं उत्तराखंड लोक सेवा आयोग के सदस्य पद से इस्तीफा देना चाहती हूंँ। इस ऐशो आराम की लाइफ ने मुझसे मेरा बोज्यू छीन लिया। मैंने इन सब को पाने के लिए कितना संघर्ष किया पर आज मुझे लगता है इन सब में वह नहीं जिन्हें मैंने जीवन भर चाहा। मैं दोबारा अपने जिले के कॉलेज में ज्वाइन करूंँगी। हम अपने गांँव में ही रहेंगे। बोज्यू के पास। वहीं, नया घर बना कर। बोलो क्या यह खुशी मुझे दे सकोगे। 

सुनील- प्रेमा। तुम्हारे और बोज्यू के बीच आने वाली हर दीवार को गिराने की हिम्मत रखता हूँ। नहीं चाहिए मुझे वो सब जो मेरी प्रेमा को खुशी न दे सके। यह सुन प्रेमा ने सुनील को गले लगा लिया।

अगले ही दिन प्रेमा उतराखंड लोक सेवा आयोग के चेयरमैन को दे आई इस्तीफा और कॉलेज जाकर पुन: ज्वाइन कर लिया। अपना सारा सामान बांँधकर पहुंँच गई अपने गांँव बगड़ी। अपने बोज्यू के पास। उत्तराखंड लोक सेवा आयोग के सदस्य से पुनः बन गई प्रोफेसर प्रेमा। अपनी चिर स्थाई खुशी की खातिर, अपने बोज्यू की खातिर। 

आज प्रेमा का घर जगमगा रहा है। बोज्यू का घुप्प अंधियारे वाला कमरा रोशनी से जगमगा रहा है। बाहर क्यारियों में फूल इधर-उधर हिल-डुल मानो अपनी प्रेमा का स्वागत कर रहे हैं। कुछ खुशियांँ, पद-प्रतिष्ठा से बढ़कर होती हैं और जो इन खुशियों खातिर जीता है उसे ही सही मायनों में जीना आता है। जैसे प्रेमा ने जीना सीखा। जो खुशियांँ हमसे हमारे अपने ही छीन ले उन खुशियों को तिलांँजलि दे देनी चाहिए। सदा- सदा के लिए क्योंकि वह चिरस्थाई खुशियों में बाधा होती है। उन बाधाओं को पार कर के ही हम उन खुशियों, चीर स्थाई खुशियों को संँजो कर रख सकते हैं।


सतबीर कश्मीरी 

असिस्टेंट प्रोफेसर 

राजकीय महाविद्यालय , करनाल, हरियाणा


1 comments:

बहुत ही सुंदर और मार्मिक 👌

REPLY

Neelam Rawat. Powered by Blogger.

घाटियों की गूंज . 2017 Copyright. All rights reserved. Designed by Blogger Template | Free Blogger Templates