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बौड़ीक ऐजा | गढ़ काव्य | नीलम रावत

 


बौड़ीक ऐजा - बौड़ीक ऐजा हे गढदेश्यों

बौड़ीक ऐजा - बौड़ीक ऐजा म्येरा मुल्की देश्यों


तुमकु जगवळ्दी स्या खौन्दरि तिबार

तुमकु जगवल्दा  तुमारा बार त्यौहार

बाटू ह्येरदी, सुजल्नि रेंदि स्या बूड्या ब्वे

बारा मैना- बारा मास तैंका आँख्योंम रवे

अपणि मातृ भूमि का खातिर तुम बौड़ीक ऐजा

बौड़ीक ऐजा ----------


तुम बिन बांजा छिन डोखरा सेरा

तुमरा बिन बांजा छिन धारा पंदेरा 

तुमू धै लंगादिन तुमारा रीति-रिवाज

द्यबतों का थान बुलौणा छिन तुमकु आज

अपणी पित्रों कि धरती थें पूजण तुम ऐजा

बौड़ीक ऐजा ---------------


तुमरा बीन सूना छिन सभी खौळा- म्येळा

ऐ जाला तुम त कौथिग भी ह्वीरेला

हरची गेनि चांचरी झुमेला भी ये बथों मा

जाण से तुमरा व रौनक भी नि रे अब गौं ख्वळों मा 

डुबदि यें संस्कृति थे छाला लगाणू कू ऐजा

बौडिक ऐजा-----------------------


घुघुती की घूर तुमकु खुदाणी च

डांडी काँठी उदास तुमथे रुसाणी च

त्वे बिना उचम्याणा छिन त्येरा खेल खिलौणा

त्वेते सुधलना छिन त्येरा घौड़ा दगणया

हिटी क जौं बाटों मा पौंछि तु दूर

वों बाटों कु करज उतन्न तु ऐजा

बौडिक ऐजा---------------------

बौडिक--------------म्येरा मुल्की

©®नीलम रावत