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What is sun halo || सौर प्रभामण्डल


SUN HALO 

 आज सुबह लगभग 10 -11  बजे से सूर्य की  बादलों से घिरी हुई कुछ विचित्र तस्वीरें लगातार सोशल मिडिया पे भ्रमण कर रहीं है।  एक  मंत्रमुग्ध कर देने वाली घटना - सूर्य के चारों ओर एक इंद्रधनुष जिसे सूर्य प्रभामंडल के रूप में जाना जाता है, आसमान  में देखा गया है  यह बेहद   आकर्षक  हैं।   तो जानिए क्या है सूर्य प्रभामंडल ?

SUN HALO क्या है ??

सूर्य प्रभामंडल ( SUN HALO ), जिसे '22 डिग्री प्रभामंडल' के रूप में भी जाना जाता है, एक प्रकाशीय घटना है जो वातावरण में निलंबित लाखों हेक्सागोनल बर्फ क्रिस्टल में सूर्य के प्रकाश के अपवर्तन के कारण होती है। यह सूर्य या चंद्रमा के चारों ओर लगभग 22 डिग्री की त्रिज्या के साथ  एक वलय का रूप लेता है।


HALOS  कहाँ बनते हैं ??

सूर्य प्रभामंडल का एक दृश्य उत्तराखंड से 


सर्कुलर हेलो विशेष रूप से सिरस (cirrus) बादलों द्वारा निर्मित होते हैं, जो पतले, अलग, छल्लेदार गुच्छेदार  बादल होते हैं। ये बादल 20,000 फीट से अधिक की ऊंचाई पर, वातावरण में बहुत ऊपर बनते हैं।

SUN HALOS ( सूर्य प्रभामंडल) के बनने के कारण क्या हैं??


 यूके स्थित वायुमंडलीय प्रकाशिकी (वेबसाइट ) के अनुसार, प्रभामंडल घटना तब होती है जब प्रकाश बर्फ के क्रिस्टल द्वारा परावर्तित और अपवर्तित होता है और फैलाव के कारण रंगों में विभाजित हो सकता है। इसने आगे बताया कि क्रिस्टल प्रिज्म और दर्पण की तरह व्यवहार करते हैं, अपने चेहरों के बीच प्रकाश को अपवर्तित और परावर्तित करते हैं, विशेष दिशाओं में प्रकाश के शाफ्ट भेजते हैं। मौसम विज्ञान के भाग के रूप में हेलोस जैसी वायुमंडलीय ऑप्टिकल घटना का उपयोग किया गया था, जो मौसम विज्ञान के विकसित होने से पहले मौसम के पूर्वानुमान का एक अनुभवजन्य साधन था। वे अक्सर संकेत देते हैं कि अगले 24 घंटों के भीतर बारिश होगी, क्योंकि सिरोस्ट्रेटस बादल जो उन्हें पैदा करते हैं, एक आने का संकेत दे सकते हैं। 

एक halo को कोई कैसे  देख सकता  है  ??

इंद्रधनुष की तरह, समकोण से देखने पर एक हेलोस  दिखाई देता है - कभी-कभी केवल सफेद दिखाई देता है, लेकिन अक्सर स्पेक्ट्रम के रंगों के साथ भी स्पष्ट रूप से मौजूद होता है। वे लाखों क्रिस्टल के सामूहिक चमक हैं जो आपकी आंखों में अपवर्तित प्रकाश को निर्देशित करने के लिए सही अभिविन्यास और कोणीय स्थिति रखते हैं।

 सूर्य या चंद्रमा का ऐसा आभामंडल इतना आम नहीं है। हालांकि, इस तरह के मंत्रमुग्ध कर  देने वाला  दृश्य  देश में पहले भी देखा गया है। ऐसा प्रभामंडल रात में चंद्रमा के चारों ओर हो सकता है, जो इसी तरह की  घटना के कारण बनता है।


राष्ट्रीय ध्वज अंगीकरण दिवस || National Flag Adoption day || hindi article

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National Flag


तिरंगे का मान सम्मान तिरंगे के लिए गर्व हम सब भारतवासियों के दिल में है. तिरंगे में सिर्फ तीन रंग ही सम्मलित  नहीं हैं बल्कि  इसमें हमारे देश की संस्कृति,सभ्यता, उन्नति , अस्मिता, अखंडता एवं भारतवर्ष के तमाम बलिदानी वीरों का त्याग और समर्पण भी समाहित है। तिरंगा भारत का प्रतिनिधित्व करता है और इस बात का द्योतक है की अब हम स्वतंत्र है. ध्वज अंगीकरण दिवस मनाने के पीछे का ध्येय यह है कि , हम उस दिन को याद करते  हैं जिस दिन हमने तिरंगे को अपनाया एवं इस दिन तिरंगे में समाहित अपनी सभ्यता संस्कृति परम्पराओं एवं वीरों के बलिदान को  दिल से सलामी एवं सम्मान देते हैं। वैसे तो तिरंगे के सम्मान  लिए हमारा हर दिन हर क्षण कुर्बान है किन्तु यह विशेष रूप से समर्पित है. 

राष्ट्रीय ध्वज अंगीकरण दिवस कब मनाया जाता है??

झंडा अंगीकरण दिवस 22  जुलाई  को तिरंगे को भारत का राष्ट्रीय ध्वज के रूप में स्वीकार  करने के उपलक्ष में मनाया जाता है। 22 जुलाई 1947 को भारतवासियों ने तिरंगे को राष्ट्रध्वज के रूप में अपनाया था। २६ जनवरी २००२ को इसमें यह संसोधन किया गया की कोई भी भारत का नागरिक अपने कार्यालय, कारखाने  एवं घर में तिरंगे को फहरा सकता है. 

 राष्ट्रध्वज का डिजाइन किसने तैयार किया  था ??

 पिंगली वेंकैया  को भारतीय राष्ट्र ध्वज तिरंगे के डिजाइन का श्रेय दिया जाता है।   1921 में पिंगली वेंकैया ने ध्वज का निर्माण किया था। भारत के लिए एक बेहतर ध्वज का निर्माण करना इतना भी आसान नहीं था। पिंगली वेंकैया ने साल 1916 से 1921 तक करीब 30 देशों के राष्ट्रीय ध्वज का अध्ययन किया, जिसके बाद उन्होंने तिरंगे को डिजाइन किया था। उस समय के तिरंगे और आज के तिरंगे में थोड़ा फर्क है। तब तिरंगे में लाल, हरा और सफेद रंग हुआ करता था क्रम भी अलग था । वहीं चरखे के चिन्ह को इसमें जगह दी गई थी। लेकिन 1931 में एक प्रस्ताव पारित होने के बाद लाल रंग को हटाकर उसकी जगह केसरिया रंग कर दिया गया।   पिंगली वेंकैया के अनुसार झंडे की मूल सरंचना में  केसरिया  हिन्दुओ का प्रतीक के रूप में था। महात्मा गांधी द्वारा शांति एवं भारत में रहने वाले बाकी समुदायों तथा देश की प्रगति के प्रतीक के रूप में चरखा का प्रतिनिधित्व करने के लिये इस ध्वज़ में एक सफेद बैंड को जोड़ने का सुझाव दिया गया।

भारतीय राष्ट्रध्वज का इतिहास : 

भारत का प्रथम राष्ट्रीय  ध्वज  ७ अगस्त १९०६ को कोलकाता ग्रीन पार्क ( पारसी बगान स्कवायर ) में फहराया गया। 

1907 में मैडम भीकाजी कामा एवं भारतीय क्रांतिकारियों  द्वारा पहली बार विदेश की धरती( जर्मनी) में  भारतीय ध्वज फहराया गय।  यह ध्वज लाल पीले हरे रंग की पत्तियों से निर्मित्त था। 

१९१७ में होमरूल आंदोलन के दौराज एक अलग ध्वज को अपनाया गया था जिसमे सप्तऋषिविन्यास में सात सितारे थे  . 

९३१ को कॉन्ग्रेस समिति की  बैठक में तिरंगे को (पिंगली वेंकैया द्वारा प्रस्तावित) कराची में  भारत के राष्ट्रीय ध्वज के रूप में अपनाया गया। ध्वज के लाल रंग को केसरिया  रंग से बदल दिया गया एवं रंगों का क्रम बदला गया। इस ध्वज की कोई धार्मिक व्याख्या नहीं की गई थी।

तिरंगे के रंगों एवं मध्य में स्थित चक्र का क्या महत्व है ??

ध्वज के सबसे ऊपर  स्थित केसरिया  रंग ‘शौर्य और साहस’ का प्रतीक है, मध्य में सफेद रंग ‘शांति’ का  एवं ध्वज के नीचे स्थित हरा रंग भारत भूमि की  "उन्नति एवं उर्वरता" का  प्रतीक है।

ध्वज में स्थित चरखे  को 24 तीलियों से युक्त अशोक चक्र द्वारा प्रतिस्थापित किया गया। इसका उद्देश्य यह दिखाना है कि " गति में जीवन है और स्थायित्त्व में मृत्यु है"  राष्ट्रीय ध्वज आयताकार आकर में होना चाहिये जिसकी लंबाई एवं चौड़ाई क्रमश 3:2 के अनुपात में हो

भारतीय संविधान राष्ट्रध्वज तिरंगे के बारे में क्या कहता है ??

संविधान का भाग IV-A (जिसमें केवल एक अनुच्छेद 51-A शामिल है) ग्यारह मौलिक कर्तव्यों की व्याख्या  करता है। अनुच्छेद 51 ए (ए) के अनुसार, भारत के प्रत्येक नागरिक का कर्तव्य होगा कि वह संविधान का पालन करे और उसके आदर्शों और संस्थानों, राष्ट्रीय ध्वज और राष्ट्रगान का सम्मान करे।

एक व्यक्ति जो राष्ट्रीय गौरव अपमान निवारण अधिनियम, 1971 के तहत वर्णित निम्नलिखित अपराधों के लिये दोषी पाया जाता है, उसे 6 वर्ष तक के लिये संसद एवं राज्य विधानमंडल के चुनावों में लड़ने के लिये अयोग्य घोषित किया जाता है। इन अपराधों में शामिल है:

  • राष्ट्रधज का अपमान करना। 
  • भारत के संविधान का अपमान करना। 
  • राष्ट्रगान गाने से रोकना। 

World Refugee Day||विश्व शरणार्थी दिवस

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शरणार्थी वह है जो बच गया और जो भविष्य बना सकता है- अमेला कोलुडेर 

क्या है विश्व शरणार्थी दिवस 

संयुक्त राष्ट्र संघ प्रत्येक वर्ष २० जून को विश्व शरणार्थी दिवस मनाता है ,यह दिवस विश्व के किसी भी क्षेत्र के महिलाओं ,बच्चों ,पुरुषों एवं वृद्धों  के साहस ,शक्ति। दृढ इच्छा के सम्मान में मनाया जाता है। जो किसी हिंसा आंदोलन युद्ध व उत्पीड़न के कारण अपनी जन्मभूमि ,कर्मभूमि व मातृभूमि को छोड़कर किसी अन्य प्रान्त, देश या जगह भाग जाने को विवश हो जाते है। 

कब हुई थी विश्व शरणार्थी दिवस की शुरुआत ??

विश्व में वर्षों पहले से कई देश विश्व शरणार्थी दिवस के समान अपने अपने कार्यक्रम आयोजित करते थे। जैसे अफ़्रीकी देश २० जून को शरणार्थी दिवस मनाते थे ,अफ़्रीकी देशों की एकता को अभिव्यक्त करने के लिए दिसंबर 2000 में संयुक्त राष्ट्र महासभा द्वारा एक प्रस्ताव पारित किया गया।  इस प्रस्ताव में वर्ष २००१ को शरणार्थियों की स्थिति से संबंधित वर्ष १९५१ कन्वेंशन की पचासवीं वर्षगांठ के रूप में चिन्हित किया गया. OAU अंतराष्ट्रीय शरणार्थी दिवस को अफ़्रीकी दिवस के साथ 20  जून को मनाने के लिए सहमत हो गया। 



1951 शरणार्थी कन्वेंशन  क्या है ??

1951 की शरणार्थी कन्वेन्शन, दूसरे विश्व युद्ध के बाद के हालात में वजूद में आई थी। संयुक्त राष्ट्र में 14 दिसम्बर 1950 को यह सन्धि उजागर हुई थी, और जुलाई 1951 में  26 देशों के प्रतिनिधियों ने इस सन्धि के मसौदे को अन्तिम रूप देने के लिये जेनेवा  में  बैठक की। 1967 में एक प्रोटोकॉल के ज़रिये  उन लोगों के लिये  सुरक्षा का दायरा बढ़ाया गया था जिन्हें अन्तरराष्ट्रीय सहायता व सुरक्षा की ज़रूरत होती है। यह सन्धि ही ये परिभाषित करती है कि कौन लोग शरणार्थी हैं और उन्हें किस  तरह की सुरक्षा, सहायता और अधिकार मिलने चाहिये।  

 ये सन्धि और प्रोटोकॉल  शरणार्थियों की रक्षा  के लिये आज भी बुनियाद का काम करते हैं और इन्होंने अनगिनत क्षेत्रीय सन्धियों व क़ानूनों के लिये प्रेरणास्रोत का काम किया है.

इनमें 1969 में  अफ़्रीका में हुई शरणार्थी कन्वेन्शन, 1984 में लातीन अमेरिका में हुआ कार्टाजेना घोषणा-पत्र और योरोपीय संघ की साझा शरणार्थी प्रणाली प्रमुख है। इस कन्वेन्शन के सिद्धान्तों के लिये  दिसम्बर 2018 में हुए शरणार्थियों पर ग्लोबल कॉम्पैक्ट के ज़रिये फिर से संकल्प व्यक्त किये गए.इन दोनों वैधानिक दस्तावेज़ों में कहा गया है कि अन्तरराष्ट्रीय सहयोग के बिना, शरणार्थियों की समस्याओं व स्थितियों का कोई टिकाऊ समाधान नहीं हो सकता.

1951 शरणार्थी कन्वेंशन वर्ष २०२१ में आपमें ७० वर्ष पुरे कर  चूका है। 

कौन हैं शरणार्थी ??

एक शरणार्थी वे लोग होते हैं जो संयुक्त राष्ट्र के अनुसार  " अपनी जाती धर्म ,राष्ट्रीयता ,किसी विशेष समुदाय की सदस्य्ता या राजनितिक विचारधारा के कारण किसी उत्पीड़ित होता है,वः अपने किसी भी प्रकार के विचारों की अभिव्यक्ति के लिए स्वतंत्र नहीं रहता और इस कारण वह अपना स्थान ,घर अथवा देश को छोड़ जाता है। 

विश्व शरणार्थी दिवस की इस साल की थीम 

"सुरक्षा का अधिकार " इस वर्ष की शरणार्थी दिवस की थीम है। 

Whoever, Whatever, Whenever. Everyone has the right to seek safety.

टिहरी का जलियावाला काण्ड :तिलाड़ी कांड/रवांई कांड||history uttarakhand

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रवां ई घाटी में 30 मई का दिन एक काला दिवस था,, तिलाड़ी कांड में शहीद हुए सभी पुण्य आत्माओं को विनम्र श्रद्धांजलि🙏

फोटो साभार :सोशल मिडिया 


यूँ तो भारत भूमि प्राचीन काल से ही वीरों के बलिदानों की भूमि रही है..हमारे महान वीरों ने अपनी माटी अपनी थाती के लिए समय समय पर अपनी वीरता का परिचय दिया और कई वीर अपनी मातृभूमि की मिट्टी के खातिर शहीद भी हो गए....

अपने हक हकूक की लड़ाई की बात करें तो उत्तराखण्ड राज्य भी वर्षों से आंदोलनों की भीम है और अपने अधिकारों के लिए यहाँ के लोगों  ने भी कई आंदोलन किये , कई लोगों को बलिदान देना पड़ा ऐसी ही अपने हक हकूक के लिए हमने अपने राज्य के खातिर राज्य के अंदर कई जगह आंदोलन किये जिनमें से तिलाड़ी आंदोलन घटना  उत्तराखंड इतिहास के पन्नो पर दिल दहलाने वाली  भी महत्वपूर्ण बर्बर  एवं  शर्मशार कर  देने  घटना है...... .

आंदोलन के कारण :

1930 में रवांई के तिलाड़ी मैदान में टिहरी रियासत के सिपाहियों जो रक्तरंजित होली खेली उससे सम्पूर्ण मानव समाज विशेष कर रवांई की जनता सिहर गयी थी. यह कोई अचानक होने वाला आंदोलन नहीं था बल्कि सदियों से चली आ रही मानव संसाधनों तथा वनाधिकारों का आंदोलन था।रियासत द्वारा जंगलात के ममलो मे हस्तक्षेप के कारण आक्रोशित जनता यमुना किनारे स्थित तिलाड़ी के  मैदान में रणनीति बनाने हेतु सभा कर रही थी...यह मसला सिर्फ जंगलात अधिकारों का ही नही वरन  जनता के ऊपर थोपे जाने वाले बेवजह के करों में बढ़ोतरी और नैकरशाही,बेगार ,प्रभुसेवा आदि से भी जनता आक्रोशित हो उठी।इस आक्रोश को चिंगारी दी एक और अमानवीय घटना ने ,टिहरी के राजा नरेंद्रशाह की राजधानी में अंग्रेज गवर्नर हेली अस्पताल की नींव रखने आये,इस आयोजन में समस्त राज्य एवम बाहर से भी कई लोग आये थे।राजा नरेंद्रशाह के राजदरबार की तरफ से गवर्नर हेली के मनोरंजन के लिए गरीब लोगों को नँगा होकर तालाब में कूदने को कहा गया। इस कारण जनमानस के मन में विद्रोह की आग जलने लगी ,आखिरकार अपने हक हकूकों की रक्षा के लिए जनता आगे बढ़ी और उन्होंने रवांई पंचायत की स्थापना करी ।

आंदोलन  का नेतृत्व :

 इस आन्दोलन का नेतृत्व साधारण किसानों ने किया। इनमें नगाणा के हीरा सिंह, कसरु के दया राम तथा खमुण्डी गोडर के बैजराम तथा लाला राम प्रसाद थे। 1930 में इन्होंने आजाद पंचायत साथ एक समानान्तर सरकार की स्थापना भी कर डाली। नेपाल के महाराजा और उनके महामंत्री की तर्ज पर हीरा सिंह को पांच सरकार और बैज राम को तीन सरकार की उपाधि दी गई। आन्दोलन की मुख्य मांग वनों के अधिकारों की वापसी थी। 20 मई 1930 को एस०डी०एम० सुरेन्द्र दत्त शर्मा, डी०एफ०ओ० पद्मादत्त रतूड़ी ने जनता पर गोली चलाई जिसमें धूम सिंह व एक अन्य व्यक्ति की मृत्यु हो गई। उत्तेजित भीड़ में से किसी बहादुर व्यक्ति ने भी गोली चलाई जिसमें एस०डी०एम० घायल हो गया। तदुपरान्त 30 मई 1930 को तिलाड़ी के मैदान में सभा चल रही थी कि रियासत के दीवान चक्रधर जुयाल के आदेश पर निहत्थे ग्रामीणों पर गोली चला दी। इस हत्याकाण्ड में अनेक ग्रामीण शहीद हुए और कई लोग गिरफ्तार किये गये उन्हें चक्रधर जुयाल ने टिहरी रियासत से बाहर के वकीलों को मुकदमा लड़ने का अधिकार नहीं दिया। लिहाजा सभी लोग दोषी पाये गये और उन्हें 15 से 20 साल के लिए जेल भेज दिया गयाबन्दी बनाये गये व्यक्तियों में 15 की मौत जेल में हो गई और उनकी लाशों को यमुना नदी में फेंक दिया गया।


दमन रवाई से बाहर भी हुआ और इस खबर को प्रकाशित 

करने वाले गढ़वाली पत्र के सम्पादक विश्वम्भर दत्त चन्दोला ने

 जब माफी नहीं मांगी तो दीवान चक्रधर जुयाल ने उन पर मुकदमा कायम किया।

 रवांई की झूठी रिपोर्ट छापी गई है, यह घोषणा कर उन्हें 

एक साल की कड़ी कैद की सजा भुगतनी पड़ी। 

टिहरी का जलियावाला काण्ड :

इस हत्याकाण्ड को टिहरी का जलियावाला भी कहा जाता है; यह रक्तरंजित घटना टिहरी रियासत की दमन और जन प्रतिरोध की सबसे बड़ी घटना थी। रवांई आन्दोलन वनाधिकारों हेतू संघर्ष के साथ-साथ रियासत की दमनकारी नीति का विरोध भी था। नई वन व्यवस्था ने रवांई की जनता में व्याप्त असन्तोष को बढ़ावा दिया था। 1927-28 में जब रवांई के किसानों ने रियासत के वन विभाग से अनुरोध किया कि उनके जानवरों को चराने के अधिकार उन्हें नई वन नीति के अन्तर्गत मिलने चाहिए तो विभाग ने उनसे कहा कि "अपने जानवरों को पहाड़ से नीचे लुढ़का दो।" इसी कारण जनता के आक्रोश के कारण रवांई क्षेत्र की आजाद पंचायत अत्यधिक लोकप्रिय हो गई। जौनपुर तथा रवांई क्षेत्र के लोग तिलाडी   के चन्दादोजरी नामक स्थान पर आजाद पंचायत की बराबर सभाएं करते थे। राजा को जब इसकी सूचना मिली तो उन्होंने रियासत के भूतपूर्व दीवान पण्डित हरिकृष्ण रतूड़ी को समस्या का समाधान करने हेतु रियासत के प्रतिनिधि के रूप में आन्दोलनकारियों के पास भेजा भी था। जनता नीति में सुधार करने की मांग प्रेषित की और रतूड़ी ने उन्हें आश्वासन भी दिया। किन्तु वन विभाग और दीवान चक्रधर जयाल नहीं चाहते थे कि समझौता हो। इसी बीच डी०एफ०ओ० पद्म दत्त रतूड़ी ने आन्दोलनकारियों दयाराम, रूद्र सिंह, राम प्रसाद और जमन सिंह पर मुकदमा कर दिया। एस०डी०एम० सुरेन्द्र दत्त शर्मा तथा डी०एफ०ओ०, पद्म दत्त रतूड़ी ने उन्हें गिरफ्तार कर 26 मई 1930 को राज गढ़ी से जब उन्हें टिहरी की ओर ले जाने लगे तभी जनता ने उनका घिराव कर अपने नेताओं को छुड़ाने का प्रयास किया। इस संकुल द्वन्द्व में डी०एफ०ओ० ने जनता पर गोलियां चला दी जिसमें तीन लोग शहीद हुए और कुछ लोग बुरी तरह घायल हो गये। गोलीकाण्ड से जनता अत्यधिक उत्तेजित हो गई और उसने एस०डी०एम० को घायल कर दिया किन्तु डी०एफ०ओ० जो दीवान चक्रधर जयाल का कृपा पात्र था, पुलिस वालों के साथ घटना स्थल से सुरक्षित निकल गया। जब घटना का समाचार दीवान चक्रधर जयाल को मिला तो उसने प्रतिशोध की भावना से प्रेरित होकर युनाइटेड प्रोविसेज की सरकार से तथाकथित विद्रोहियों पर गोली चलाने की विशेष अनुमति प्राप्त कर ली। दुर्भाग्यवश उस समय टिहरी  रियासत के शासक नरेन्द्र शाह यूरोप के दौरे पर थे, यह हत्याकाण्ड नहीं होता जिसमें सुन्दर लाल बहुगुणा चिपको नेता के अनुसार 12 लोग मारे गये और कई घायल हुए। सूचना विभाग, उत्तर प्रदेश का मत है कि इस हत्याकाण्ड में 200 लोग मारे गये। दीवान चक्रधर जयाल स्वय गोली चलाने के आदेश दे रहे थे। इस घटना से पूर्व जयाल ने कर्नल सुरेन्द्र सिंह को आदेश दिये थे कि बागियों को सबक सिखाओ। उन्होंने जब मना किया तो उनकी सेवाएं समाप्त कर दी गई और उनके स्थान पर नाथू सिंह सजवाण को रवाई भेजा गया।

रवाई हत्याकाण्ड के बाद जनता ने वाइसराय को लिखित रूप से अनुरोध किया कि दीवान चक्रधर जयाल तथा डी०एफ०ओ० पद्म रतूड़ी जिनके कारण यह हत्याकाण्ड हुआ उन्हें सजा दी जाये। ब्रिटिश गढ़वाल के लोग भी टिहरी रियासत के समर्थन में थे। उन्होंने जयाल और रतूड़ी को खूनियों की संज्ञा भी दे डाली किन्तु इसके बावजूद उन पर कोई कार्यवाही नहीं की गई। राजा भी ब्रिटिश सरकार के समर्थन के कारण चाहते हुए भी इन हत्यारों को दण्डित नहीं कर सके।